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Sunday, September 27, 2020

The Loin Of The Desert : भारतीय उपमहाद्विप का जाँबाज योद्धा उमर मुख्तार।

उमर मुख्तार भारतीय उपमहाद्विप का वह योद्धा जिसने दुश्मनों का जीना हराम कर दिया, साम्राज्यवाद के खिलाफ जम कर लड़ा और कभी भी गुलामी को स्विकार नही किया। 

Umar Mukhtar @ Desh Rakshak News
गिरफ्तारी के बाद उमर मुख्तार

 उमर मुख्तार ने कहा, "हम आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, हम जीतते हैं या मरते हैं, हुकुमत के जुल्म के खिलाफ लड़ने की ताकत हमारे बाप ने हमे दी है ! तुम्हारी हर नस्ल को उमर मुख्तार मिलते रहेंगे !


मुदकमे के दौरान जज उमर मुख्तार से पूछता है,

जज : क्या तुम मानते हो कि तुमने विद्रोह किया है?

उमर मुख्तार : हाँ

जज : क्या तुमने अपने लोगों को ईटली सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित किया?

उमर मुख्तार : हाँ

जज __ क्या तुम जानते हो इसकी सजा क्या होगी ?

उमर मुख्तार  :  हाँ

जज  : तो फिर अफसोस के साथ तुम्हारा अंजाम मौत है!

उमर मुख्तार  : मूझे कोई अफसोस नहीं यही मेरी जिंदगी का  बेहतरीन अंजाम होगा!

जज सलाह देते हुए और मौत का खौफ दिलाकर लालच देकर उमर मुख्तार को कहता है, कि अगर तुम अपने आन्दोलन को रोक दो और क्रांतिकारियों को कहो की वह मसलह तहरीक ( उमर मुख्तार का आन्दोलन ) छोड़ दें तो तुम्हें छोड़ दिया जाएगा, उमर मुख्तार जज को एक लम्हे के लिए देखता है, और फिर अपना एतिहासिक कौल कहता है, " हम या तो शानदार फतह हासिल करेंगें या फिर वतन के लिए अल्लाह की राह में शहीद होंगें , और यही हमारी जिंदगी का असल मकसद है, तुम लोग नस्ल दर नस्ल हमे खत्म करने की कोशिस करते रहो, तुम्हारी हर नस्ल को मुख्तार मिलते रहेंगें। "


15वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक साम्राज्यवाद का दौर था, जब यूरोपियन देशो ने साम्राज्यवाद के विस्तार के लिए एशिया और अफ़्रीक़ी देशों पर चढ़ाई शुरू की तो उनका मुकाबला करने के लिये कुछ ऐसे शेर दिल लोग सामने आए जिन्होने न सिर्फ अपने लोगों की अगुआई की और उन्हे अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की तरफ़ लौटने का संदेश दिया बल्कि यूरोपियन के सामने वो चैलेंज पेश किया की खुद यूरोपियन उनकी बहादुरी के सामने घुटने टेक दिए तो साथ मे उनके सामने व्यवहार व मेल मिलाप का वो नमूना पेश किया की जो यूरोपियन इतिहास अब तक पेश करने मे नाकाम है.. इनमे से एक थे लीबिया के मुख़्तार - उमर मुख़्तार । उनका पुरा नाम उमर अल मुख्तार मुहम्मद बिन फरहत अल मनिफी था, उनकी बहादुरी के लिए उन्हे रेगिस्तान का शेर The Lion of The Desert कहा जाता था। उनका जन्म तत्कालिन ओटोमन साम्राज्य में 20 अगस्त 1858 ई० को लिबिया के जनजुर में हुआ था और उनकी मृत्यु 16 सितम्बर 1931 को सुलुक, लिबिया में हुआ, जब उन्हे ईटली की साम्राज्यवादी सरकार ने फाँसी की सज़ा दी।


उमर मुख्तार एक धर्मगुरु थें, 1895 ई० में वो सुडान चले गए और वहाँ ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध मेंहदी सुडानी के आंदोलन में भाग लिया लेकिन इस आंदोलन की विफलता के बाद वह वापस लिबिया लौट आए, वापस लौटने के बाद लिबिया पर ईटली के अतिक्रमण को रोकने के लिए उन्होने ईटली की मुसोलिनी सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया। 1911 ई० में ईटली ने सल्तनत ए उस्मानिया से युद्ध कर के लिबिया पर कब्जा कर लिया, लिबिया पर ईटली के अतिक्रमण को खत्म करने के लिए लिबिया के लोगों ने ईटली के खिलाफ विद्रोह कर दिया उन विद्रोहियों में उमर मुख्तार भी थें।


उमर मुख्तार के सशस्त्र विद्रोह का असर ये हुआ कि ईटली के साम्राज्यवादी सरकार के मुखिया मुसोलिनी को एक ही साल में लिबिया के चार जनरल बदलने पड़े, आखिरकार हार मान कर मुसोलिनी को अपने सबसे क्रूर सिपाही जनरल ग्राज़ानी को लीबिया भेजना पड़ा। उमर मुख़्तार और उनके सिपाहियों ने जनरल ग्राज़ानी को भी बेहद परेशान कर दिया, जनरल ग्राज़ानी की तोपों और आधुनिक हथियारों से लैस सेना को घोड़े पर सवार उमर मुख़्तार व उनके साथी खदेड़ देते थें, ईटली की साम्राज्यवादी सेना दिन में लीबिया के शहरों पर कब्ज़ा करती और रात होते होते उमर मुख्तार उन शहरों को आज़ाद करवा देता।

उमर मुख़्तार इटली की सेना पर लगातार हावी पड़ रहा था और नए जनरल की गले ही हड्डी बन चुका था, अंततः जनरल ग्राज़ानी ने एक चाल चली, उसने अपने एक सिपाही को उमर मुख्तार से लीबिया में शांति समझौता करने के लिए बात करने को भेजा, उमर अपनी मांगे सिपाही के सामने रखते हैं, सिपाही चुप चाप उन्हें अपनी डायरी में नोट करता जाता है सारी मांगे नोट करने के बाद सिपाही उमर मुख्तार को बताता है की यह सारी मांगे इटली भेजी जाएंगी और मुसोलिनी के सामने पेश की जाएंगी, इटली से जवाब वापस आते ही आपको सूचित कर दिया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगेगा जिसके चलते उमर मुख़्तार को इंतज़ार करने को कहा गया, उमर मुख्तार इंतज़ार करते हैं और इटली की सेना पर वे अपने सारे हमले रोक देते हैं। मगर इटली से क्या आता है? खतरनाक हथियार, बम और टैंक - जिससे शहर के शहर तबाह कर दिए जा सके, जनरल ग्राज़ानी ने समय समझौते के लिए नहीं बल्कि धोखे से हथियार मँगाने के लिए माँगा था। कपटी ग्राज़ानी अपनी चाल में सफल हुआ और नए हथियारों से लीबिया के कई शहर पूरी तरह से तबाह कर दिए गए।


फिर भी मैदान ए जंग में उमर मुख़्तार दो साल तक ईटली की साम्राज्यवादी सरकार के खिलाफ लड़ते रहें औऱ इटली की फ़ौज के साथ हुए एक झड़प में घायल हुए उमर मुख़्तार को 11 सितम्बर 1931 को जनरल ग्राज़ानी की फ़ौज ने गिरफ़्तार कर लिया, 15 सितम्बर 1931 को हाथों में, पैरों में, गले में हथकड़ी जकड़ उमर मुख़्तार को जनरल ग्राज़ानी के सामने पेश किया गया, 73 साल के इस बूढे शेर से जनरल ग्राज़ानी ने कहा " तुम अपने लोगों को हथियार डालने कहो" ठीक पीर अली ख़ान की तरह इसका जवाब उमर मुख़्तार ने बड़ी बहादुरी से दिया और कहा "हम हथियार नही डालंगे, हम जीतेंगे या मरेंगे और ये जंग जारी रहेगी.. तुम्हे हमारी अगली पीढ़ी से लड़ना होगा औऱ उसके बाद अगली से...और जहां तक मेरा सवाल है मै अपने फांसी लगाने वाले से ज़्यादा जीऊंगा ..और उमर मुख़्तार की गिरफ़्तारी से जंग नही रुकने वाली ... जनरल ग्राज़ानी ने फिर पुछा " तुम मुझसे अपने जान की भीख क्युं नही मांगते ? शायद मै युं दे दुं..." उमर मुख़्तार ने कहा "मैने तुमसे ज़िन्दगी की कोई भीख ऩही मांगी दुनिया वालों से ये  न कह देना के तुमसे इस कमरे की तानहाई मे मैने ज़िन्दगी की भीख मांगी" इसके बाद उमर मुख़्तार उठे और ख़ामोशी के साथ कमरे से बाहर निकल गए। इसके बाद 16 सितम्बर सन 1931 ईसवी को इटली के साम्राज्यवाद के विरुद्ध लीबिया राष्ट्र के संघर्ष के नेता उमर मुख़्तार को उनके ही लोगो के सामने फाँसी दे दी गई।


Umar Mukhtar @ Desh Rakshak News

अदालत में जाते उमर मुख्तार


नोट- फोटो और इनपुट विकिपिडिया और अन्य

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